Tuesday, June 21, 2011

जीना इसी का नाम है( नैनीताल(1)


                                                   ''नैनीताल (1)''

उन दिनों 1980मे मुझे(c.mohan) और मेरे एक दोस्त(ब्रिज कुमार ) को घुमने का बड़ा शौक चढ़ा था|उन दिनों मै पढने के साथ -साथ जॉब भी किया करता था, रात को हम दो जोड़ी कपडे बैग में रखते और निकल पड़ते,मेरा दोस्त बैंक मै  जॉब किया करते थे| हम शनिवार की शाम को निकलते अगले दिन सन्डे होता और monday की सुबह meerut वापस |कभी -कभी लॉन्ग ट्रीप पर छुट्टी भी लेकर  जाते थे |

रात को बस पकड़ी और निकल पडे,मुझे और मेरे दोस्त हम दोनों को ही पुराने गाने सुनने और गाने का बहुत शौक था,दीवानगी की हद तक |तब न तो I -PODथे और ना ही मोबाइल फ़ोन, पोकेट ट्रानजिस्टर था पर कही-कहीं पर सिग्नल ना मिलने की वजह से वो घड-घड करने लगता था|

 नैनीताल हम कोई तीन या चार बजे पहुचे,दो बस बदल कर कुछ समझ नहीं आया तो बस स्टैंड पर ही बैठ गए अप्रैल का महिना था,ठण्ड भी अच्छी हो रही थी,चाय पीने का बड़ा मन किया पर इतनी सुबह??
          

हमने तीन घंटे गाने गा कर गुजारे फिर, एक होटल में एक कमरा लिया,फिर फ्रेश होकर घुमने निकल पडे मेरे दोस्त को आलू के परांठे खाने का बड़ा शौक था |बोला यार पहले नाश्ता करते हैं,मुझे खाने से  ज्यादा घुमने का शौक था,और अभी भी है|सब चीजो से फ्री होकर हमने नैनि  झील में सैर की नाव पर तभी अचानक मौसम ख़राब होने लगा हम वापस आ गए |फिर नैना देवी  जी के दर्शन किये,नैनीताल के दोनों और सडके हैं तल्लीताल और मल्लीताल माल रोड पर घूमना बहुत अच्छा लगता है | वहां देखने लायक जगह हैं,नैनापिक,सात ताल,नौकुचिया ताल,जगेश्वेर,चिड़ियाघर,रोपेवे|      
    
मंदिर के पास ही एक  स्कूल का फूटबाल मैच चल रहा था|बहुत देर तक हम देखते रहे,फिर मार्केट में ही बैठ गए एक बैंच पर,फिर रोपेवे पर चले गए फिर शाम को वापस आ गए  रात हो चली थी,अपने कमरे में वापस आ गए अगले दिन चिड़ियाघर,जगेश्वेर और अंग्रेजो का मंदिर देखने का तय करके सो गए |क्रमश:  
चलते-चलते =